100 Shabdon Ki Kahaniyan
Mubashshir Ali Zaidi₹199₹24920% off
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Seller: Rekhta Publication
| Item Weight: | 300 Grams |
|---|---|
| ISBN: | 9788198302687 |
| Author: | Obaidullah Aleem |
| Language: | Hindi |
| Publisher: | Rekhta Publication |
| Pages: | 149 |
| Dimensions: | 21 x 14 x 1 cm |
| Book type: | Paperback |
| Publishing year: | 2025 |
| Genre: | Poetry |
उबैदुल्लाह अलीम की शायरी आम ज़िन्दगी के जाने-पहचाने लम्हों और रोज़मर्रा के तज्रबों को इस तरह बयान करती है कि वो एक गहरे और असरदार एहसास में बदल जाते हैं। उनकी शायरी दिल और ज़ेहन—दोनों पर असर डालती है। अलीम ने उस दौर की चलन में आई हुई शायरी की परम्परा या स्टाइल को नहीं अपनाया, बल्कि उन्होंने एक अलग और नई रूमानी संवेदना के साथ अपने अशआर में ताज़गी भरी है। उनकी शायरी में सिर्फ़ मोहब्बत या दर्द ही नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के अलग-अलग पहलुओं की झलक भी मिलती है। अलीम के अशआर पढ़ते हुए महसूस होता है कि वो शायरी को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं मानते, बल्कि एक गहरी और संवेदनशील तज्रबे की तरह पेश करते हैं। उबैदुल्लाह अलीम अविभाजित हिन्दुस्तान की भोपाल रियासत में 11 जनवरी 1939 को पैदा हुए। शुरूआती तालीम भोपाल ही में हासिल की। उनके वालिद सियालकोटी, कश्मीरी थे और वालिदा का तअल्लुक़ भोपाल से ही था। उन्होंने 1967 में कराची यूनीवर्सिटी से उर्दू अदब में एम.ए. किया। फिर वो पाकिस्तान टेलीविज़न में बहैसियत प्रोड्यूसर मुलाज़िम हो गए। अलीम ग़ज़ल में मीर तक़ी ‘मीर’ की परम्परा का अनुसरण करते थे लेकिन समसामयिकता और आधुनिकता के भी क़ायल थे। उबैदुल्लाह अलीम का पहला मज्मूआ-ए-कलाम ‘चाँद चेहरा सितारा आँखें’ 1974 में प्रकाशित हुआ जिसे असाधारण रूप से सराहना मिली और उनके कलाम की शोहरत दुनिया भर में होने लगी। दूसरा मज्मूआ-ए-कलाम ‘वीरान सराय का दिया’ 1986 में सामने आया। अलीम की ग़ज़लों के साथ-साथ उनकी नज़्में भी बहुत मक़बूल हुईं। ये बेमिसाल शायर 18 मई 1998 को इस दुनिया से कूच कर गया।
उबैदुल्लाह अलीम की शायरी आम ज़िन्दगी के जाने-पहचाने लम्हों और रोज़मर्रा के तज्रबों को इस तरह बयान करती है कि वो एक गहरे और असरदार एहसास में बदल जाते हैं। उनकी शायरी दिल और ज़ेहन—दोनों पर असर डालती है। अलीम ने उस दौर की चलन में आई हुई शायरी की परम्परा या स्टाइल को नहीं अपनाया, बल्कि उन्होंने एक अलग और नई रूमानी संवेदना के साथ अपने अशआर में ताज़गी भरी है। उनकी शायरी में सिर्फ़ मोहब्बत या दर्द ही नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के अलग-अलग पहलुओं की झलक भी मिलती है। अलीम के अशआर पढ़ते हुए महसूस होता है कि वो शायरी को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं मानते, बल्कि एक गहरी और संवेदनशील तज्रबे की तरह पेश करते हैं। उबैदुल्लाह अलीम अविभाजित हिन्दुस्तान की भोपाल रियासत में 11 जनवरी 1939 को पैदा हुए। शुरूआती तालीम भोपाल ही में हासिल की। उनके वालिद सियालकोटी, कश्मीरी थे और वालिदा का तअल्लुक़ भोपाल से ही था। उन्होंने 1967 में कराची यूनीवर्सिटी से उर्दू अदब में एम.ए. किया। फिर वो पाकिस्तान टेलीविज़न में बहैसियत प्रोड्यूसर मुलाज़िम हो गए। अलीम ग़ज़ल में मीर तक़ी ‘मीर’ की परम्परा का अनुसरण करते थे लेकिन समसामयिकता और आधुनिकता के भी क़ायल थे। उबैदुल्लाह अलीम का पहला मज्मूआ-ए-कलाम ‘चाँद चेहरा सितारा आँखें’ 1974 में प्रकाशित हुआ जिसे असाधारण रूप से सराहना मिली और उनके कलाम की शोहरत दुनिया भर में होने लगी। दूसरा मज्मूआ-ए-कलाम ‘वीरान सराय का दिया’ 1986 में सामने आया। अलीम की ग़ज़लों के साथ-साथ उनकी नज़्में भी बहुत मक़बूल हुईं। ये बेमिसाल शायर 18 मई 1998 को इस दुनिया से कूच कर गया।